जनवरी 2026 में यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) द्वारा लागू किए गए “Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026” को सरकार और UGC ने उच्च शिक्षा में भेदभाव खत्म करने की दिशा में बड़ा कदम बताया। लेकिन लागू होते ही ये नियम देशभर के कॉलेजों और Universities में विवाद और विरोध का कारण बन गए।
सबसे तेज़ आवाज़ उठी है जनरल कैटेगरी छात्रों की, जो इन नियमों को समानता से ज़्यादा एकतरफा और “रिवर्स बायस” को बढ़ावा देने वाला बता रहे हैं ।
क्या हैं UGC के नए ‘Equity Rules 2026’?
UGC (University Grants Commission) के मुताबिक, इन नियमों का मकसद कैंपस में जातिगत भेदभाव, उत्पीड़न और असमानता को रोकना है। इसके तहत सभी उच्च शिक्षण संस्थानों को:
- Equal Opportunity Centre (EOC)
- Equity Committee
- 24×7 हेल्पलाइन
- Equity Squad और मॉनिटरिंग सिस्टम
स्थापित करना अनिवार्य किया गया है। नियमों का पालन न करने पर संस्थान की UGC मान्यता या फंडिंग पर असर पड़ सकता है ।
कागज़ों में यह व्यवस्था प्रगतिशील दिखती है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इसे लेकर कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
General Category छात्रों का विरोध क्यों?
1. झूठी शिकायतों पर कोई स्पष्ट सज़ा नहीं
सबसे बड़ा आरोप यह है कि नए नियमों में फर्जी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों पर कार्रवाई का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। छात्रों का कहना है कि केवल आरोप के आधार पर ही किसी का अकादमिक रिकॉर्ड, छवि और करियर खतरे में पड़ सकता है ।
सोशल मीडिया पर बार-बार यह सवाल उठ रहा है:
“अगर शिकायत गलत साबित हो जाए, तो आरोपी छात्र को हुए नुकसान की भरपाई कौन करेगा?”
2. नियमों का ढांचा ‘एकतरफा’ क्यों माना जा रहा है?
जनरल कैटेगरी छात्रों का आरोप है कि Equity Committees और संबंधित बॉडीज़ में उनके अधिकारों और प्रतिनिधित्व को लेकर कोई स्पष्ट सुरक्षा नहीं दी गई। इससे यह भावना बन रही है कि नियम पहले से ही एक वर्ग को दोषी मानकर चलते हैं ।
यही कारण है कि सोशल मीडिया पर “Reverse Discrimination” और “Institutional Bias” जैसे शब्द ट्रेंड कर रहे हैं।
3. भेदभाव की परिभाषा बहुत अस्पष्ट
नियमों में “प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष भेदभाव” जैसे शब्दों की स्पष्ट कानूनी व्याख्या नहीं की गई है। छात्रों को डर है कि सामान्य बहस, अकादमिक असहमति या व्यक्तिगत टकराव को भी भेदभाव बताकर शिकायत दर्ज की जा सकती है ।
यह अस्पष्टता कैंपस में डर और असुरक्षा का माहौल पैदा कर रही है।
4. कैंपस फ्रीडम और स्वायत्तता पर असर
कई शिक्षाविदों और छात्रों का मानना है कि लगातार निगरानी, हेल्पलाइन और स्क्वॉड्स से कैंपस की स्वतंत्रता और खुली बहस की संस्कृति प्रभावित हो सकती है।
आलोचकों के अनुसार, इससे समस्याओं का समाधान कम और ध्रुवीकरण ज़्यादा होगा ।
Social Media और News Platforms पर क्या चल रहा है?
- X (Twitter) पर #UGCEquityRules, #UGCRollback जैसे हैशटैग ट्रेंड कर चुके हैं
- Reddit और छात्र फोरम्स पर नियमों को “career-threatening” बताया जा रहा है
- कई वायरल पोस्ट्स में दावा किया गया कि ये नियम “शिकायत-आधारित सज़ा प्रणाली” बना सकते हैं
यह बहस अब सिर्फ ऑनलाइन नहीं रही, बल्कि कैंपस मीटिंग्स और छात्र संगठनों तक पहुंच चुकी है।
मामला सुप्रीम कोर्ट तक क्यों पहुंचा?
विवाद इतना बढ़ा कि UGC के इन नियमों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि कुछ प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन कर सकते हैं ।
अब सबकी नजरें अदालत के रुख और UGC की अगली प्रतिक्रिया पर टिकी हैं।
UGC के Equity Rules से उपजी वास्तविक समस्याएँ: जो नियमों में नहीं दिखीं

UGC के नए Equity Rules को भले ही “समानता” और “सुरक्षा” की भाषा में पेश किया गया हो, लेकिन ज़मीनी स्तर पर ये नियम कैंपस जीवन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और छात्र-मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करते हैं। नीचे वे समस्याएँ हैं, जिन पर न UGC ने विचार किया और न ही नीति-निर्माताओं ने सार्वजनिक रूप से जवाब दिया।
1. कैम्पस में पुलिस का प्रवेश: कॉलेज या एक्टिव क्राइम सीन?
किसी भी शैक्षणिक संस्थान में पुलिस की सक्रिय भूमिका पूरे कैंपस को एक संभावित अपराध स्थल में बदल देती है।
जहाँ अब तक गैर-हिंसक विवादों या कथित टिप्पणियों पर अधिकतम सज़ा निलंबन या आंतरिक अनुशासनात्मक कार्रवाई होती थी, वहीं नए नियमों के तहत पुलिस को सीधे शामिल करने की मानसिकता अपनाई गई है।
यहाँ मूल दोष इंटेंट में है—
एक कथित “भेदभावपूर्ण टिप्पणी” को गंभीर आपराधिक कृत्य मान लेना, जबकि—
- “ब्राह्मणों की कब्र खोदने”
- “चार जूते मारने”
जैसी सार्वजनिक और प्रलेखित टिप्पणियाँ आज तक अपराध की श्रेणी में नहीं आईं,
और जाति पूछने वाले तथाकथित प्रोफेसर सरकारी सलाहकार बने हुए हैं।
तो सवाल यह है—
अपराध की परिभाषा चयनात्मक क्यों है?
2. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा प्रहार
College जीवन बच्चों के लिए वह पहला चरण होता है जहाँ वे स्कूल के अनुशासनात्मक ढाँचे से बाहर आकर खुलकर सोचने, बोलने और बहस करने का अवसर पाते हैं।
- व्यंग्य
- उपहास
- तीखी बहस
- वैचारिक टकराव
ये सब किसी भी जीवंत अकादमिक संस्कृति का हिस्सा होते हैं।
लेकिन नए नियमों ने छात्रों के मन में यह डर बैठा दिया है कि “कौन-सा वाक्य, किस संदर्भ में, किसे आपत्तिजनक लग जाए” और कब वह पुलिस केस में बदल जाए।
यह माहौल छात्रों को चुप रहने, सतर्क रहने और आत्म-सेंसरशिप के लिए मजबूर करता है।
3. जातिवादी छात्र संगठनों के लिए नया हथियार
यह नियमावली व्यावहारिक रूप से जातिवादी छात्र संगठनों को निशानदेही और द्वेष-आधारित केस दर्ज कराने का एक वैधानिक रास्ता देती है।
जो समूह आज खुलेआम “जूते चार” जैसे नारे लगाते हैं, वही कल किसी असहमत छात्र को झूठे आरोपों के ज़रिए जेल तक भिजवाने की कोशिश करेंगे।
यह नियम न्याय से ज़्यादा शक्ति संतुलन (power imbalance) को संस्थागत रूप देता है।
4. आँकड़े कुछ और कहते हैं, नैरेटिव कुछ और
सरकार के सामाजिक न्याय मंत्रालय के स्वयं के आँकड़े बताते हैं:
- SC/ST Act में औसत कन्विक्शन रेट सिर्फ 8%
- जातिगत अपराधों में 81% आरोपित OBC वर्ग से
- 2200+ कॉलेज कैम्पसों में पूरे वर्ष में
सिर्फ 378 जातिगत भेदभाव के केस
फिर सवाल उठता है—
अगर समस्या रैम्पेंट नहीं है,
तो इतनी कठोर और दंडात्मक नियमावली लाने का तर्क क्या है?
एक नैरेटिव गढ़ा गया कि “दलितों के साथ व्यापक अत्याचार हो रहा है”,
जबकि आँकड़े इस दावे का समर्थन नहीं करते।
5. सवर्णों के खिलाफ विषैली टिप्पणियों पर चुप्पी क्यों?
पिछले 15 वर्षों में:
- सोशल मीडिया
- कॉलेज की दीवारें
- छात्र संगठनों के नारे
सबसे अधिक घृणास्पद जातिगत टिप्पणियाँ ब्राह्मणों/सवर्णों के विरुद्ध देखने को मिली हैं।
- देवताओं का अपमान
- ग्रंथों का मज़ाक
- जातियों को मिटाने की हिंसक भाषा
फिर Equity Rules में “विशेषकर” शब्द जोड़ते समय इस वास्तविकता को क्यों नज़रअंदाज़ किया गया?
क्या समानता का अर्थ चयनात्मक सुरक्षा है?
6. झूठे केस का दंड कहाँ है?
सबसे गंभीर सवाल—
- झूठे केस में फँसकर
- पुलिस कार्रवाई झेलकर
- अकादमिक समय और मानसिक स्वास्थ्य खोकर
अगर कोई छात्र टूट जाता है, या आत्महत्या जैसा कदम उठा लेता है, तो जवाबदेही किसकी होगी?
आज College Campus में
आत्महत्याओं की संख्या, कथित जातिवादी टिप्पणियों के मामलों से अधिक है।
भविष्य का डर, पारिवारिक दबाव और करियर की अनिश्चितता,
आज के छात्र को पहले ही मानसिक रूप से कमज़ोर बना चुके हैं।
फिर भी नियमों में:
- झूठी शिकायत पर जुर्माना नहीं
- नुकसान की भरपाई नहीं
- दोगुने दंड का प्रावधान नहीं
यह चूक नहीं, नीतिगत लापरवाही है।
निष्कर्ष: समानता या नई असमानता?
इसमें कोई शक नहीं कि भारतीय उच्च शिक्षा में भेदभाव एक वास्तविक समस्या है और उसे रोकने के लिए सख्त व्यवस्था ज़रूरी है। लेकिन समानता के नाम पर अगर नियम असंतुलित लगें, तो विरोध भी उतना ही स्वाभाविक है।
आज सवाल यह नहीं है कि Equity चाहिए या नहीं, सवाल यह है कि:
क्या Equity Rules सभी छात्रों के लिए समान रूप से न्यायपूर्ण हैं?
यह पूरी नियमावली इंटेंट के स्तर पर ही दोषपूर्ण प्रतीत होती है।
कैंपस का उद्देश्य होना चाहिए:
- विचारों का टकराव
- मित्रताओं का अंकुरण
- दीर्घकालिक रिश्ते
ना कि—
- हेड-हंटिंग
- जातिगत राजनीति
- पुलिसिया डर
आवश्यक सुधार:
- पुलिस की भूमिका केवल गंभीर हिंसा तक सीमित हो
- केस के निपटारे तक किसी पक्ष पर कार्रवाई न हो
- फर्जी केस पर दूना दंड अनिवार्य हो
- हर जाति को जातिवादियों से समान सुरक्षा मिले
अगर UGC इन नियमों में पारदर्शिता, संतुलन और फर्जी शिकायतों पर स्पष्ट कार्रवाई जैसे प्रावधान जोड़ता है, तो शायद यह टकराव संवाद में बदल सके। वरना, यह विवाद आने वाले समय में भारतीय कैंपस राजनीति और शिक्षा व्यवस्था में नई दरारें पैदा कर सकता है।
Disclaimer: This article is based on publicly available facts and data, while the interpretations and conclusions expressed are solely the author’s personal opinion.
